स्नेह प्रवीण के एनर्जेटिक टीम का एक ओर नया सामाजिक कार्य..........
स्नेह प्रवीण की एनर्जेटिक टीम मेडिकल चौक में
शिवभोजन में श्रमदान करते हुए.......
सनेहप्रविन अनाथाश्रम , वृद्धाश्रम रास्ते के उपर रहने वाले लोगो के लिए अनाज का दान हो या कपड़ों का दान हो या शिक्षा का दान करते रहता है पर इस बार स्नेह प्रवीण के होनहार एनर्जेटिक टीम ने कुछ अनोखा सोचा और वहीं अनोखा काम करने की सोची.....
आज के युवा पीढ़ी में समाजकार्य की नीव रखना बहुत जरूरी हैं तो ही वी अपनो के साथ साथ दूसरे के बारे में भी सोचना शुरू कर देंगे.........
आपको श्रमदान का मतलब पता चले करके कुछ यहां लिखा हुआ है किसी इंसान ने लिखा है पर बहुत खूब लिखा हैं
….............श्रमदान महादान..............
श्रमदान महादान होता है ये सार्वजनिक हित के कार्य के लिए मिल-जुलकर किया गया सहयोग होता है। ये आपसी एकजुटता का परिचायक भी होता है।
दान की महिमा अपरम्पार है। दान के छः अंग माने जाते हैं।
दाता प्रतिगृहीता च शुद्धि देर्यं च धर्मयुक।
देशकालो च दानानाम अंग्ड्न्येतानी षड विदु।।
दाता,प्रतिगृही, पवित्रता,दान की वस्तु ,देश और काल।
आन्दाश्रूणि रोमान्चो बहुमान:प्रियं वच।
तथानुमोदता पात्रे दानभूषण पंचकम्।।
*श्रम दान महादान ना कोई ज़ात ना कोई धर्म ना कोई संस्थान जान बचाये वही इंसान*
मानव जीवन में दान का बढ़ा महत्व है. दान कई रूप में किया जा सकता है। श्रमदान भी इसी का एक हिस्सा है. वास्तव में श्रमदान से बढ़ा कोई दान नहीं है क्योंकि इस दान के माध्यम से कई लोगों को राहत मिलती है. निर्माण कार्य में स्वेच्छा से अवैतनिक सेवा एवं सहयोग देना श्रमदान कहलाता है.
अक्सर श्रमदान का आयोजन कोई देशी संस्था ही करवाती है
दान देते समय आनंद के अश्रु हो,देने का रोमांच हो,
मीठे बोल,आदर का भाव और लेने वाला सुपात्र हो तो ही दान की महिमा है।
यदि तिरस्कार के साथ,कुपात्र को, अभिमान पूर्वक दान दिया जाय तो दान का श्रेय नष्ट हो जाता है।
अनुकुले विधो देयं एत: पूरयिता हरि:।
प्रतिकुले विधौ देयं यत:सर्व हरिष्यति।।
समय अनुकूल हो या प्रतिकूल दान अपनी सामर्थ्य अनुसार अवश्य करना चाहिए, क्योंकि देने वाला भी भगवान और हरने वाला भी भगवान।
यदि आप एक हाथ से दान देते हैं तो वो हजार हाथों से लौटता है।
दान केवल आर्थिक मदद ही नहीं होता है।जो भी देश, काल, परिस्थितियों के अनुसार, अपनी सामर्थ्य में निस्वार्थ भाव से अर्पण कर सकें वही दान होता है
अंत:करण की शुद्धि के लिए विभिन्न धर्मों विभिन्न शास्त्रों में अनेक प्रकार के उपाय बताए गए हैं । अंत:करण की शुद्धि मनुष्य के भीतर दया सौंदर्य और सहानुभूति जैसी अनेक दुर्लभ भावनाओं को भर देता है ।
अंत:करण को विशुद्ध करने के लिए अनेक सात्विक मार्ग बताए गए हैं वहीं एक मार्ग श्रमदान भी है ।
श्रमदान अपने आप में एक श्रेष्ठ मार्ग है इससे हमारा मानसिक एवं शारीरिक विकास नियमित रूप से हो जाता है । श्रमदान एक तरफ विश्व-बंधुत्व की भावना को प्रज्ज्वलित करता है तो दूसरी तरफ हमारे जीवन में ज्ञान का सच्चा प्रकाश भे फैलाता है ।
भारत की अनेक महत्वपूर्ण परंपराओं में से श्रमदान भी एक परंपरा है । प्राचीन भारत में इसका अपना एक अलग अस्तित्व था । मनुष्य के मन में एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और सच्ची संवेदना थी । श्रमदान का सीधा-सा अर्थ स्वार्थ-रहित होकर जनकल्याण के कार्यों में लग जाना है ।
छात्र-नौजवान देश में प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित लोगों के साथ हमदर्दी और सहयोग करके इस बात का परिचय देते हैं कि उनके भीतर की मानवता अभी समाप्त नहीं हुई है और वे निरंतर श्रमदान द्वारा पीड़ितों विस्थापितों को अपना सहयोग-सहायता पहुँचाते है।
डर मत दर डर मत आगे बढ़ आगे बढ़
Don't give up.
Keep pushing.
Keep fighting!
Stay strong.
Never give up.
Never say 'die'.
Come on! You can do it!.
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